Thursday, September 26, 2019

Do I really need Health Insurance?




क्या हेल्थ इंश्योरेंस या स्वास्थ बीमा पॉलिसी लेना मेरे लिए ज़रुरी है? यह प्रश्न लोगों के मन में कई बार आता है. जब कम उम्र होती है और स्वास्थ अच्छा होता है तो सोचता है कि मुझे इस पर फालतू में पैसे बर्बाद करने की क्या जरूरत, जब एम्प्लायर से हेल्थ इंश्योरेंस कवर मिला हो तब तो हेल्थ इंश्योरेंस लेना बेवकूफी लगती है, जब अपने व्यवसाय या प्रोफेशन में हों और कमाई बहुत अच्छी ना हो तो ऐसे खर्च गैर-जरुरी और अपने बजट से बाहर के लगते हैं और जिनकी कमाई अच्छी हो उनको लगता है कि मै क्यूँ हेल्थ इंश्योरेंस के झंझट में पडूं, जब कुछ होगा तो इतना पैसा है मेरे पास कि मुझे कोई समस्या नहीं होगी.

लेकिन यही लोग जब किसी अन्य व्यक्ति की बीमारी और उस पर होने वाले हॉस्पिटल और दवाओं के खर्च के बारे में सुनते हैं या देखते हैं तो मन में यह भी आता है कि बाप रे इतने खर्चे !!! देश में मेडिकल सुविधाएँ कितनी महंगी हैं ? अगर मेरे ऊपर ऐसी समस्या आएगी तो क्या होगा ??? क्या मेरी इतनी बचत है? क्या मेरे एम्प्लायर द्वारा दिया गया हेल्थ इंश्योरेंस पर्याप्त है? तो क्या थोडा सा प्रीमियम दे कर 5-10 लाख या उस से अधिक का हेल्थ इंश्योरेंस लेने में समझदारी नहीं है ?  


आज इस ब्लॉग के माध्यम से  समझने का प्रयास करेंगे कि हेल्थ इंश्योरेंस लेना किसके लिए जरुरी है, किसके लिए  नहीं है , जरुरी है तो क्यूँ है, किसे और कब हेल्थ इंश्योरेंस लेना चाहिए?

क्या हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेना जरुरी है?


बिना आवश्यकता के कोई भी वस्तु या सेवा खरीदने में समझदारी नहीं होती, यह पैसे को सही इस्तेमाल करने वाले किसी भी व्यक्ति की सोच होती है लेकिन इंश्योरेंस एक ऐसी चीज है जो जरुरत न होने पर ही मिलती है.


हेल्थ इंश्योरेंस तब किसी को नहीं मिलेगा जब उसे कोई गंभीर बीमारी हो जाय या किसी दुर्घटना के समय जब वो हॉस्पिटल में एडमिट हो . एक बार आदमी अस्वस्थ हो गया तो इंश्योरेंस कवर मिलने में बहुत समस्या होती है.

 इसलिए अगर किसी का यह तर्क हो कि इंश्योरेंस की आवश्यकता उसको या उसके परिवार को नहीं है क्यूंकि वह स्वस्थ है तो यह तर्क उस व्यक्ति और उसके परिवार के लिए नुकसान देह हो सकता है.


क्यूँ लें हेल्थ इंश्योरेंस?

  1.  जरुरी नही की हर समय घर में या  बैंक अकाउंट में पर्याप्त धन राशि 💵💴 हो, हेल्थ इंश्योरेंस में कैशलेस सुविधा होना व्यक्ति को बड़े मेडिकल खर्चों और धन की व्यवस्था करने की बड़ी चिंता से बचाता है.

  2. बढती उम्र के साथ मेडिकल खर्चे बढ़ना निश्चित है. बढती उम्र, अपने साथ कई बीमारियाँ लेकर आती हैं और साथ में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है ऐसे में समय रहते अपने स्वास्थ के प्रति सचेत होने और बीमारियों के खर्च से निपटने के लिए सही व्यवस्था ना बनाई तो बुढ़ापा बहुत दुःख दाई हो सकता है. हेल्थ इंश्योरेंस बढ़ती उम्र में फाइनेंसियल सिक्योरिटी देता है. सही तरीका है आप या तो मेडिकल सम्बंधित खर्च के लिए समय रहते फण्ड बनाइये या तो हेल्थ इंश्योरेंस प्लान समय रहते खरीदिये. 

  3.  बीमारी 💉कभी भी बता कर नही आती, अपने स्वास्थ के प्रति आदमी का गैर जिम्मेदाराना रवैया और कुछ जिन्दगी की भाग दौड़ में अपने लिए टाइम ना निकाल पाना भी बीमारियों लिए काफी हद तक जिम्मेदार होती हैं. आज कल लोगों के खान-पान और लाइफ स्टाइल में परिवर्तन भी बीमारियां बढ़ा रही हैं ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस की जरुरत और बढ़ जाती है.

  4. हॉस्पिटल 🏥 में डिस्काउंट ऑफर  नही चलते, जितना खर्चा आएगा उसकी व्यवस्था व्यक्ति को या उसके परिवार को करनी ही पड़ती है और यदि पैसे की व्यवस्था न हो तो इलाज संभव नहीं हो पाता इसलिए जरुरी है कि व्यक्ति के पास पर्याप्त पैसे हो या पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस कवर. एक बीमारी कई बार परिवार की कई सालों की बचत एकाएक ले जाती है और साथ में ही सर पर कर्ज का बोझ भी डाल जाती है. आदमी सालों तक तमाम जतन कर के 10-15 लाख रूपये बचाता है और वो एक झटके में हॉस्पिटल में एडमिट होते ही ख़त्म हो जाता है.
  5. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 40% लोगों को Hospitalized होने पर या तो अपनी संपत्तियां 💍🚕📿 बेचनी पड़ती हैं या कर्ज लेना पड़ता है, ऐसे में अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि हेल्थ इंश्योरेंस कितना आवश्यक है.

  6. हेल्थ इंश्योरेंस ना केवल हॉस्पिटल में एडमिट होने पर खर्चे बचाता है बल्कि हॉस्पिटल में एडमिट होने के पहले और बाद के खर्चे भी कवर करता है, जो की कई बार एक अच्छा खासा अमाउंट हो जाता है.

  7.  हेल्थ इंश्योरेंस में पहले से हुई बीमारियाँ भी एक निश्चित अवधि के बाद कवर हो जाती हैं जिसका फायदा भी व्यक्ति ले सकता है. पहले से हुई बीमारियों को कुछ पालिसी 2 साल बाद कवर करती हैं और कुछ 3 या 4 साल बाद.

  8.  बहुत बार लोगों के व्यवसाय बीमारी की दोहरी मार में बंद हो जाते हैं एक तरफ तो हॉस्पिटल का खर्च और दूसरी तरफ व्यवसाय पर ध्यान ना दे पाना ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस कम से कम एक तरफ से किसी को बचा सकता है.

  9.  एक अनुमान के अनुसार लगभग 16% भारतीय परिवार, बीमारी के खर्च के कारण अभाव ग्रस्त या गरीब हो जाते हैं और उन्हें अपने पुराने लाइफ स्टाइल को वापस पाने में कई वर्ष लग जाते हैं.

  10. मेडिकल इमरजेंसी का एक बड़ा कारण होती हैं दुर्घटना. सड़क पर आप खुद तो सेफ ड्राइव कर सकते हैं लेकिन दूसरे वाहन और उसके चालक की गारंटी नही ले सकते ऐसी मेडिकल इमरजेंसी में हेल्थ इंश्योरेंस काफी मददगार हो सकता है. घर में, वाशरूम में गिर जाने से भी लोगों को कई बार गंभीर चोटें लग जाती हैं, जिसके इलाज में भी भी लाखों रूपये जेब से झट से गायब हो जाते हैं.

  11.  इलाज पहले की तरह सस्ते नही रहे, मेडिकल खर्चे 10-12% से ज्यादा हर साल महंगे हो जाते हैं, गंभीर बीमारियों के खर्च लाखों में होते हैं. इसलिए बिना हेल्थ इंश्योरेंस के आदमी आर्थिक परेशानी में फंस सकता है 

  12.  बड़े मेडिकल खर्च आसानी से उठा सकना सबके बस का नहीं है . मेडिकल क्षेत्र में पिछले वर्षों में काफी तरक्की हुई है जिसके परिणाम स्वरूप जो बीमारी कभी लाइलाज होती थीं उनका इलाज संभव है लेकिन गंभीर बीमारियाँ का इलाज बहुत खर्चीला होता है, जिसका खर्च उठा पाना एक आम आदमी के बस की बात नहीं है. गंभीर बीमारियाँ जैसे कैंसर, ह्रदय रोग, किडनी से सम्बंधित, स्पाइन से सम्बन्धित सर्जरी या अंग प्रत्यारोपण में खर्चे लाखों में आते हैं. इसलिए ऐसे खर्चो के लिए जरुरी है कि आपके परिवार के पास हेल्थ इंश्योरेंस की सुरक्षा हो. 

नीचे दिए हुए इन्फोग्राफिक्स को ध्यान से पढ़िए, आपको खुद ही अंदाजा लग जायेगा कि किस बीमारी के इलाज में अभी कितने खर्च आ रहे हैं. 




किसको हेल्थ इंश्योरेंस नहीं लेना चाहिए ?


1-जिसे  एम्प्लायर से जिन्दगी भर के लिए उसके और उसके परिवार के लिए स्वास्थ सेवा की सुविधा मिली हो, जो कहीं भी जा कर किसी भी बीमारी का इलाज मुफ्त ले सकता हो.

2-जिसके पास अत्यधिक धन सम्पत्ति हो और उसके लाख-दस लाख या बीस-पच्चीस लाख रूपये मायने न रखते हों.

3-जिसे इस बात का भरोसा हो कि उसे या उसके परिवार को कभी भी बीमारी या दुर्घटना के कारण हॉस्पिटल का मुंह नहीं देखना पड़ेगा.


किसको हेल्थ इंश्योरेंस लेना चाहिए ?


वैसे हेल्थ इंश्योरेंस सभी के लिए आवश्यक है, लेकिन अक्सर लोग इसे प्राथमिकता नहीं देते इसलिए मै कहूँगा  जो लोग अपने ऊपर आकस्मिक खर्चो का बोझ नहीं डालना चाहते और उसके लिए पहले से तैयार रहना चाहते हैं ऐसे लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस जरुर लेना चाहिये वो भी पर्याप्त हेल्थ कवर के साथ.



कब ले सकते है हेल्थ इंश्योरेंस?

अभी, क्योंकि स्वस्थ बीमा तब ले जब आपको इसकी आवश्यकता ना हो, क्योंकि जब आपको इसकी जरुरत होगी मतलब जब कोई अस्वस्थ हो जाता है तब स्वस्थ्य बीमा उसे मिल नही पाता. बढती उम्र, गलत खान-पान और बुरी लाइफ स्टाइल अपने साथ बीमारियां लेकर आती हैं और एक बार कोई व्यक्ति बीमार (शुगर, हार्ट, आर्थराइटिस) हो गया तो उसे हेल्थ इंश्योरेंस मिलता नहीं और अगर मिलता भी है तो वो तमाम शर्तों और अधिक प्रीमियम दे कर.

स्वास्थ बीमा फायदे के लिए नहीं होने वाले आर्थिक नुकसान से बचने के लिए लिया जाता है, इसलिए हेल्थ इंश्योरेंस फायदे के नजरिये से नहीं बल्किआर्थिक नुकसान से बचने के नजरिये से लें.

कितने का होना चाहिए रिस्क कवर ?

कुछ लोग कहते हैं कि सालाना कमाई का 50% से 100% का हेल्थ कवर जरुर होना चाहिए. लेकिन रिस्क कवर कितने अमाउंट का होना चाहिये यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि व्यक्ति किस शहर में रहता है, वहाँ पर मेडिकल फैसिलिटी कैसी है और उसकी कॉस्ट कितनी है? इसलिए बड़े महानगरों में रहने वालों का रिस्क कवर छोटे शहर में रहने वाले से कहीं ज्यादा होना चाहिए. बेहतर है इस सम्बन्ध में अपने फाइनेंसियल एडवाइजर से विस्तार से चर्चा करें.



अगर एम्प्लायर से हेल्थ इंश्योरेंस मिला है तब भी अलग से पालिसी लेना जरुरी है ?

यदि एम्प्लायर जीवन पर्यंत (रिटायरमेंट के बाद भी) आपका और आपके परिवार का मेडिकल खर्च उठाने के लिए तैयार हैं तब तो आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि यह सुविधा नौकरी की अवधि से जुड़ी है तो इसकी जरुरत है क्यूंकि जब नौकरी नहीं रहेगी तब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत पड़ेगी और उस समय बड़े मेडिकल एक्स्पेंसेस को अपनी बचत से देना बहुत महंगा पड़ सकता है. साथ में यह प्रश्न जरुर अपने आप से पूछना चाहिये कि क्या जितना कवर एम्प्लायर दे रहा है उतना पर्याप्त है? क्या उतने बजट में और उन शर्तों में सारे इलाज संभव हैं यदि नहीं तो जरुर लें.
वैसे मुझे लगता है किसी को भी एम्प्लायर द्वारा दी गई इस सुविधा के साथ-साथ अपने और अपने परिवार के लिए एक बैकअप प्लान के तौर पर शुरू से ही एक हेल्थ पालिसी लेनी चाहिए और समय के साथ -साथ उसका कवर भी बढ़ाते रहना चाहिए.


हेल्थ इंश्योरेंस लेने के निर्णय को टालने से हो सकता है बड़ा नुकसान ?

बीमा उत्पाद चाहे स्वास्थ हो या जीवन को लेने के निर्णय को टालना नहीं चाहिए, क्यूँकि इसे लेने में आप जितना लेट करेंगे उतना ही आपका नुकसान होगा. कई बार लोग कोई बीमारी पता चलने के बाद बहुत हाथ पाँव मारते हैं कि उनको स्वस्थ बीमा मिल जाय लेकिन तब उन्हें मिल नहीं पाता और तब उन्हें पता चलता है कि निर्णय लेने में थोडी देर हो गई. 

कई बार लोग अपने लिए बेस्ट प्लान ढूंढने के चक्कर में महीनों लगा देते हैं और ये जानते और समझते हुए भी कि उनके लिए यह निर्णय जरुरी है फिर भी किसी नतीजे पर पहुँच नहीं पाते. उनको यह समझाना बहुत जरुरी है कोई भी हेल्थ इंश्योरेंस प्लान बेस्ट नहीं है और सबके प्रीमियम एक बराबर नहीं होते, सबके फीचर एक जैसे नहीं मिलेंगे तो ज्यादा समय विचार करने में ना लगायें, निर्णय जल्दी लें और अपनी जरूरत के आधार पर लें. क्यूंकि आप ने अलग गलत निर्णय ले भी लिया है तो फ्री लुक पीरियड है,आप उस समय में पालिसी सरेंडर कर सकते हैं, साथ में कुछ महीनों के बाद भी आप रिफंड लेकर पालिसी बंद कर सकते हैं. अगर भविष्य में आपको बेहतर प्लान मिलता है या मौजूदा प्लान में कोई कमी नजर आती है तो आप पालिसी पोर्ट भी कर सकते हैं तो फिर इतना सोचना क्यूँ ? 


आज के समय हेल्थ इंश्योरेंस एक आवश्यकता है इस बात को जितनी जल्दी समझ जाएँ उतना अच्छा है और यदि किसी को 10-15 या 20-30 हजार रुपये साल का देना ज्यादा लगता है तो सोचिये....कभी ऐसा हुआ है कि जरुरत लाखों में हुई तो उसका क्या होगा. इसलिए समय रहते हुए हेल्थ इंश्योरेंस एडवाइजर से बात करें और अपनी जरुरत के अनुसार हेल्थ इंश्योरेंस प्लान जरुर लें .

Saturday, September 7, 2019

क्या 1st Oct से आपकी EMI घटने वाली है?




4th Sept को RBI ने एक नया सर्कुलर जारी किया जिसके अनुसार बैंकों को 1st Oct, 2019 से सारे फ्लोटिंग रेट लोन की ब्याज दरों को एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक करना होगा.

मीडिया इस सर्कुलर के बारे में  लोगों को इस तरह से बता रही है कि आपके होम लोन और कार लोन की EMI 1st Oct से घटने वाली है. क्या मीडिया का यह विश्लेषण सही है या इसके मायने कुछ और हैं..आइये समझते हैं..

सबसे पहले यह समझते हैं कि फिक्स्ड और फ्लोटिंग रेट लोन क्या है?

फिक्स्ड रेट लोन में ब्याज दरें लोन के रिपेमेंट के दौरान चेंज नहीं होती यानि पूरे समय ब्याज दरें एक ही रहती हैं.

फ्लोटिंग रेट लोन में ब्याज दरें अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में परिवर्तन के साथ घटती बढती रहती हैं.


क्या है ये नया सिस्टम?

RBI के सर्कुलर के अनुसार सिर्फ फ्लोटिंग रेट लोन की ब्याज दरों को एक्सटर्नल बेंचमार्क से जोड़ने की बात हो रही है और नई दरें सिर्फ नए लोन पर लागू होंगी. पुराने लोन की ब्याज दरों पर इस सर्कुलर का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. यह नई व्यवस्था सिर्फ इंडिविजुअल के लिए है, नॉन इंडिविजुअल के लिए नहीं. फिक्स्ड रेट लोन पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी. साथ में ही यह सर्कुलर केवल बैंक के ऊपर लागू होगा किसी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी पर नहीं क्यूंकि हाउसिंग फाइनेंस कंपनी अभी भी RBI के अंतर्गत नहीं आती. हालाँकि इस साल के बजट में इनको भी RBI के अंतर्गत लाने की घोषणा हो चुकी है.

अभी तक फ्लोटिंग रेट लोन की ब्याज दरें बैंक के इंटरनल बेंचमार्क से लिंक रहती थीं.. जैसे PLR, Base Rate और  MCLR (Marginal cost of lending). यह सभी बेंचमार्क, बैंक द्वारा ब्याज दरों को निर्धारित करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए समय-समय पर लाये गए. लेकिन RBI को लगता है कि ये सिस्टम अभी भी अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में उतने सफल नहीं रहे. जैसे पिछले 1 वर्ष में RBI ने रेपो रेट में लगभग 1 की कमी की लेकिन बैंको ने ब्याज दरें 0.25%-0.30% तक ही घटाई. इसके उलट जब भी RBI ने पहले रेपो रेट बढ़ाये तो बैंक ब्याज दरें बढ़ाने में  तेजी दिखाते रहे.

इसलिए RBI ने यह निष्कर्ष निकाला कि इंटरनल बेंचमार्क का उपयोग बैंक अपने फायदे के लिए अधिक कर रहे हैं और अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों को घटाने के प्रयास में RBI इसी लिए पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहा.

अब इसी समस्या का समाधान करने के लिए RBI ने यह सर्कुलर जारी किया है कि जिस से बैंक आगे से ब्याज दरें निर्धारित करने के लिए ऐसे बेंचमार्क का प्रयोग करें जिसका नियंत्रण बैंकों के हाथ में ना हो. ऐसे बेंचमार्क जिनका रेट या तो मार्केट से निर्धारित हो रहे हो या RBI से...

जैसे - RBI Repo Rate या 3-6 महीने के सरकारी T-Bill.. 

रेपो रेट जहाँ RBI के कंट्रोल में होता है वहीँ T-Bill के रेट मार्केट निर्धारित करता है

तो अब 1st Oct से बैंक नए फ्लोटिंग रेट लोन पर ब्याज का निर्धारण के लिए Repo rate या T-Bill के rate में अपना Spread जोड़ेगा.. जो कुछ इस तरह से होगा 

New Floating Rate Interest on Loans = External Benchmark + Spread

जहाँ तक बैंक स्प्रेड की बात है वो भी बैंक पहले से निर्धारित करनी होगी और उसमें परिवर्तन की इजाजत RBI किसी विशेष परिस्थति में ही देगा.

क्या पुराने लोन पर नई ब्याज दरें लागू होंगी?

नहीं, पुराने लोन में कोई परिवर्तन नहीं होगा उनकी ब्याज दरों का निर्धारण पुराने सिस्टम यानि MCLR पर ही होगा. यदि आप अपने लोन को नये सिस्टम में लाना चाहेंगे तो बैंक एक निश्चित प्रोसेसिंग फीस लेकर आपके लोन को एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक कर देगा लेकिन एक बार आप अपने लोन को नए सिस्टम  में शिफ्ट कर लेते हैं तो फिर आपको पुराने सिस्टम में वापस जाना संभव नहीं होगा.

क्या आपको नए सिस्टम में अपना लोन शिफ्ट कर देना चाहिए?

नया सिस्टम ज्यादा पारदर्शी होगा और बैंको का ब्याज दर निर्धारण पर नियंत्रण कम होगा, जिस से आगे से बैंक अपने अनुकूल ब्याज दरें नहीं निर्धारित कर पायेंगे और उसका फायदा आने वाले समय में निश्चित रूप से आम उपभोक्ता को मिलेगा. इसलिए मुझे लगता है कि अच्छा होगा अपने लोन इस सिस्टम में शिफ्ट कर लें.

1st Oct के बाद अपने बैंक से इस नए सिस्टम के बारे में अवश्य पूछताछ करिये, अगर आपको लगे नए सिस्टम के अंतर्गत आप को लोन ट्रान्सफर करने में फायदा है तो जरुर करिये.
  

RBI इस बार यह सुनिश्चित करने का भी प्रयास कर रहा है कि बैंक के पास नए सिस्टम को सही तरह से लागू करें इसलिए RBI ने यह भी आदेश दिया है कि बैंक अपनी सुविधा अनुसार बेंचमार्क को समय-समय पर ना बदलें. मतलब एक तरह के लोन के लिए एक बेंचमार्क होगा, जैसे होम लोन को अगर बैंक ने Repo से लिंक किया है तो सभी लोगों को होम लोन Repo से ही लिंक रहेगा साथ ही ब्याज को रिसेट करने का विकल्प भी लोन लेने वालों को 3 महीने में एक बार मिलेगा.

निश्चित रूप से नई व्यवस्था बैंक के लिए उतनी अच्छी नहीं है, क्यूँकि बैंक के कण्ट्रोल में बेंचमार्क रेट होंगे नहीं और वो अपना स्प्रेड भी आसानी से चेंज ना ही कर पाएंगे. ऐसे में बैंक के ग्राहकों के लिए यह व्यवस्था अच्छी है क्यों कि यह अधिक पारदर्शी है और RBI द्वारा लिए गए फैसलों का प्रभाव उनके लोन पर जल्दी और लगभग  पूरी तरह से पड़ेगा.

यदि ब्लॉग आप को उपयोगी लगे तो अपने परिवारजनों, मित्रों एवं शुभ चिंतको को अवश्य फॉरवर्ड करें.